पश्चिम बंगाल पुलिस को बुधवार को बड़ी सफलता मिली, जब शीर्ष माओवादी नेता शाकुंतला महतो उर्फ पुष्पा ने कोलकाता पुलिस मुख्यालय लालबाजार में आत्मसमर्पण कर दिया। अधिकारियों के अनुसार, वह झारखंड के सारंडा जंगल में संयुक्त सुरक्षा बलों के अभियान के दौरान वहां से भाग निकली थी। पश्चिम बंगाल में उसके छिपे होने की अटकलों के बीच सीपीआई (माओवादी) की जोनल कमेटी सदस्य शाकुंतला महतो ने बुधवार को हथियार और 46 राउंड गोलियों के साथ आत्मसमर्पण किया। उसके सिर पर 10 लाख रुपये का इनाम घोषित था।
पुलिस के अनुसार, शाकुंतला कई बड़ी माओवादी गतिविधियों की मास्टरमाइंड रही है। आत्मसमर्पण के दौरान उसने कहा, “हमारे संगठन के जो साथी अब भी अलग-थलग हैं, उन्हें मुख्यधारा में लौटने की कोशिश करनी चाहिए। वर्तमान सरकार कई अच्छे काम कर रही है। हथियार छोड़कर विकास की मुख्यधारा से जुड़ना सभी के हित में है।
शाकुंतला महतो पश्चिम बंगाल के झारग्राम जिले के बेलपहाड़ी थाना क्षेत्र के मेचुआ गांव की रहने वाली है। माओवादी संगठन में शामिल होने के बाद वह परी, वर्षा और पुष्पा जैसे कई नामों से जानी गई, जबकि अपने गांव के आसपास उसे ‘लुटुन’ नाम से भी पहचाना जाता था। बताया जाता है कि वह महज 10 वर्ष की उम्र में माओवादी संगठन से जुड़ गई थी। पांचवीं कक्षा में दाखिला लेने के बावजूद उसने आगे की पढ़ाई नहीं की और नक्सली संगठन में गीत-संगीत के कार्यक्रमों से जुड़ने के बाद हथियार उठा लिया। वाम मोर्चा शासन के दौरान पुलिस उसकी लगातार तलाश कर रही थी, जिसके चलते उसे झारखंड के पारसनाथ पहाड़ियों में भेज दिया गया। बाद में संगठनात्मक कार्यों के लिए उसे फिर बंगाल वापस लाया गया।
साल 2003 में झारग्राम में सक्रिय माओवादी दस्ते के दौरान उसकी मुलाकात एरिया कमांडर अतुल महतो से हुई। वर्ष 2004 में सीपीआई (माओवादी) का गठन हुआ और 2005 में झारखंड के तामार जंगल में दोनों ने विवाह कर लिया। इसके बाद संगठन ने उसे बेलपहाड़ी, दलमा, घाटशिला, गोटाशिला, पारसनाथ पहाड़, बुंडू-तामार, सारंडा सहित कई इलाकों में संगठनात्मक जिम्मेदारियां सौंपीं।
वाम शासन के दौरान उसने झारग्राम के लालगढ़ आंदोलन में कुख्यात माओवादी नेता किशनजी के साथ भी काम किया। वर्ष 2012 के बाद सीपीआई (माओवादी) की बंगाल इकाई झारखंड चली गई, लेकिन वहां भी सुरक्षा बलों के दबाव में उसका नेटवर्क कमजोर पड़ता गया। केंद्र सरकार द्वारा देश से माओवादी और नक्सली गतिविधियों के सफाए के लिए चलाए गए व्यापक अभियान के दौरान कई उग्रवादी मारे गए, गिरफ्तार हुए या उन्होंने आत्मसमर्पण किया। लंबे समय तक जंगलों में सक्रिय रहने के बाद शाकुंतला महतो ने भी हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया।

