Chhattisgarh:बिलासपुर की स्वास्थ्य व्यवस्था और संवेदनहीनता की एक अत्यंत दुखद और विचलित करने वाली तस्वीर पेश करता है।
कल्पना ही की जा सकती है कि उस मरीज़ पर क्या बीत रही होगी, जिसे चिलचिलाती धूप में स्ट्रेचर पर सड़क के रास्ते ले जाया जा रहा है।
मजबूरी: नर्सिंग होम से दूसरे सेंटर पर सोनोग्राफी के लिए भेजा जाना, और एम्बुलेंस की सुविधा न मिल पाना या न देना, सीधे तौर पर मरीज़ की जान से खिलवाड़ है।
अमानवीय दृश्य: स्ट्रेचर पर तड़पता मरीज़, साथ में छाता पकड़े थक चुका तीमारदार, और बगल से गुज़रती एम्बुलेंस… यह नज़ारा मानवता की चीख-चीख कर हत्या जैसा है।
“मानवता सिर्फ़ शर्मसार नहीं हुई..बल्कि पसीने से तरबतर भी हुई” – यह वाक्य उस भीषण गर्मी में मरीज़ और उसके साथ चल रहे व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक पीड़ा को पूरी तरह बयां करता है।
यह घटना बिलासपुर के निजी नर्सिंग होम्स की जवाबदेही पर बड़े सवाल उठाती है। क्या मरीज़ की सुरक्षा, सुविधा और गरिमा का कोई मोल नहीं है? ऐसे दृश्य चिकित्सा जगत के लिए शर्मनाक हैं।

