रोम-रोम में बसे राम…..छत्तीसगढ़ में रामनामी सम्प्रदाय के लोगों के लिए भगवान श्रीराम के नाम से बढ़कर कुछ भी नहीं है। यह श्रीराम जी के परम भक्ति के सबसे बड़े उपासक हैं।

सतानत संस्कृति के विविध रूप हैं। यह वह परंपरा है जिसमें भक्ति और अध्यात्म की अद्भुत धारा का संगम है। छत्तीसगढ़ में रामनामी सम्प्रदाय के लोगों के लिए भगवान श्रीराम के नाम से बढ़कर कुछ भी नहीं है। यह श्रीराम जी के परम भक्ति के सबसे बड़े उपासक हैं।

“बड़े भजन मेला महोत्सव” भी इसी सनातन संस्कृति का प्रतीक है। मेले की परंपरा 150 साल से ज्यादा पुरानी है। पौष माह की एकादशी से आयोजित होने वाला यह मेला रामनामी भजनों की एक अनूठी मिसाल को पेश करता है।

रामनामी समाज के लोगों ने अपने शरीर में राम का नाम गुदवाकर कहीं बाहर ईश्वर को खोजने की बजाए उन्हें खुद में स्थापित कर लिया है। रामनामी समाज के लोग कठिन साधना करते हैं। पूरे शरीर में राम का नाम गुदवाते हैं। ओढऩी भी राम नाम की ही ओढ़ते हैं। अगर आप छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के चारपारा गांव से गुजरते हैं और कोई शख्स ऐसा दिखता है, जिसके पूरे शरीर पर भगवान राम का नाम गुदा हुआ है, उसके सिर पर मोरपंख की पगड़ी है, समझ लीजिए कि वो शख्स रामनामी संप्रदाय से ताल्लुक रखता है। कहा जाता है कि अयोध्या के राजा भगवान श्रीराम की पूजा और उनका नाम जपना ही इस संप्रदाय के जीवन का एकमात्र मकसद है। रामनामी संप्रदाय का मानना है कि किसी भी सीमा और आनंद से ऊपर भगवान प्रभु श्रीराम की भक्ति करना ही है। शायद, इसलिए न सिर्फ रामनामी संप्रदाय के लोग अपने शरीर पर बल्कि घर की दीवारों पर भी भगवान राम लिखवाते हैं ताकि जब भी आंख खुले भगवान राम की भक्ति में जुट जाएं।

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