पिता की विरासत को आगे बढ़ाने वाले म्यूजिक स्टार, हिमेश का नाम भी लिस्ट में शामिल है


23 जुलाई 1973 को मुंबई में संगीतकार हिमेश रेशमिया ने अपने संगीतकार के रूप में शुरुआत की सलमान खान की फिल्म ‘प्यार तो डरना क्या’ से। यह फिल्म हिट रही और हिमेश रेशमिया एक्टर, प्रोड्यूसर सलमान खान कैंप के फेवरेट म्यूजिक प्रोडक्शन बन गए। हिमेश रेशमिया न सिर्फ संगीतकार के तौर पर हिट रहे बल्कि कई हिट गाने भी गाए। हिमेश रेशमिया बॉलीवुड के जाने माने संगीतकार संगीतकार रेशमिया के बेटे हैं। आज हिमेश रेशमिया अपना 50वां जन्मदिन मना रहे हैं। आइए जानते हैं, हिंदी सिनेमा के पिता, पुत्र के संगीतकार, जोड़ियों के बारे में:

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एस डी बर्मन/आर डी बर्मन

भारतीय सिनेमा के संगीत क्षेत्र में सचिन देव बर्मन (एस डी बर्मन) का बहुत बड़ा योगदान है। एस डी बर्मन ने वर्ष 1937 से लेकर चार दशक तक अपने संगीत का जादू जारी रखने वाले संगीतकारों के रूप में अपनी ऐतिहासिक शुरुआत की। एक पार्श्वगायक के रूप में एस डी बर्मन ने कई फिल्मों में गीत भी गाये। उनके बेटे आर डी बर्मन भी प्रसिद्ध संगीतकार रहे हैं। आर डी बर्मन ने 1960 से लेकर 1990 के दशक तक संगीत की रचना के लिए 331 फिल्में बनाईं।


रौशनी/राजेश राजेश रौशनी

संगीतकार के रूप में रोशन लाल नागथ ने अपने करियर की शुरुआत केदार की फिल्म ‘नेकी और बड़ी’ से साल 1949 में की और साल 1973 तक संगीतकार के तौर पर सक्रिय रहे। उनके बेटे राजेश रोशन भी संगीतकार के तौर पर काफी सफल रहे हैं। संगीतकार के तौर पर राजेश रोशन को सबसे पहली ब्रेक महमूद की फिल्म ‘कुंवारा बाप’ साल 1974 में मिली। उनकी मां इरा रोशन भी इंजीनियर रही हैं और संगीत की प्रोफेसर राजेश रोशन ने अपनी मां से ही ली।


चित्रगुप्त/आनंद मिलिंद

चित्रगुप्त ने संगीत रचना के लिए कई यादगार फिल्में बनाईं। भोजपुरी सिनेमा में भी वह सक्रिय हैं। चित्रगुप्त ने साल 1946 में फिल्म ‘फाइटिंग हीरो’ से संगीतकार के रूप में अपने करियर की शुरुआत की और साल 1988 तक सक्रिय रहे। उनके बेटे आनंद और मिलिंद हिंदी सिनेमा के सफल संगीतकार हैं। आनंद मिलिंद ने साल 1984 में फिल्म ‘अब आए मजा’ से संगीतकार के रूप में अपने करियर की शुरुआत की और ‘कयामत से कयामत तक’ के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा।


सरदार सरदार/अनु मित्र

संगीतकार सरदार आमिर ने संगीतकार के तौर पर अपने करियर की शुरुआत साल 1949 में रिलीज फिल्म ‘राज’ से की लेकिन सही मायने में उन्हें पहचान मिली साल 1953 में रिलीज फिल्म ‘लैला मजनू’ और ‘ठोकर’ से। सरदार मालिक ने अपने इतिहास में करीब 600 लेखकों की रचनाएँ लिखीं। उनके बेटे अनु आमिर ही मुख्य रूप से अपने पिता की संगीत विरासत संभाले हुए हैं। इस पीढ़ी में तीसरे संगीतकार के तौर पर डी ज़ू मालिक के बेटे अमल मालिक भी हिंदी सिनेमा के जाने माने संगीतकार हैं।


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